Wednesday, March 24, 2010

रास्ता

एक था रास्ता
चलता हुआ सा
कुछ थे पॉंव
रुकते हुए से
इक थी मंज़िल
धूंडती हुई सी

पॉंव ही जब रुक गये तो
रास्ता ये चले किसके लिए
मंज़िल खुद धूंडने लगी तो
रास्ता ये चले किसके तले
रास्ता ही गर ना रहा तो
दिल ये बेहाल कैसे फ़ुले

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